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Wednesday, August 16, 2017

चक्रव्यूह


ज़िन्दगी की कुछ उलझने सुलझाने निकला , 
और उलझनों का इजाफा हो गया,   
घुस तो गया उलझनों में , 
सुलझाते सुलझाते चक्रव्यूह में घिर गया।    

कुछ उलझने बिना बात की थी , 
कुछ छोटी से उलझने -बवाल निकली , 
कुछ तो सिर्फ मेरे दिमाग में थी , 
और कुछ कई सवालो का जवाब निकली।  

अधिकतर उलझनों का हल  मेरे पास ही था , 
पहल मैं ही क्यों करूँ ? पर अटका था , 
कुछ मेरे संकोचो ने  और कुछ मेरी "मैं " ने , 
आज मुझे इस इस चक्रव्यूह में फँसा दिया था।  

अब निकलना तो मुझे ही होगा , 
अपने को संतुलित करना होगा , 
खुले दिमाग से सोचना होगा ,
"मैं" के खोह से निकलना होगा।  

शायद तभी इस चक्रव्यूह को भेद पाउँगा , 
"मैं" अकेला सब कुछ नहीं हूँ , 
"अहम " का मुझे त्याग करना होगा,
मुझे जीवन यात्रा में बहुतो का साथ चाहिए होगा।   

Monday, August 14, 2017

आज़ादी के सत्तर वर्ष


आज़ादी को सत्तर वर्ष बीत गए
हम अभी तक  धर्म संप्रदाय में उलझे रहे
दुनिया ने तरक्की के नए आयाम गढ़  लिए
हम अभी तक  " बेटी बचाओ" में फंसे रहे।  

हम मेहनत की कमाई से टैक्स भरते रहे
वो हमारे पैसो से मौज उड़ाते रहे।  
हम जनता " भाईचारा " बनाते चले
वो " फूट  डालो " की नीति पर चलते रहे
आज़ादी को हमारे सत्तर वर्ष बीत गए।  

जनता के लिए - जनता द्वारा - जनता से
सरकार को हमारी सत्तर साल हो गए
गरीब जनता से चुने हुए उसके ही प्रतिनिधि
जाने कब से उसकी किस्मत के "ठेकेदार" हो गए
देखते देखते - आज़ादी को हमारे सत्तर वर्ष बीत गए।

हो सके तो इस दिवस पर - तिरंगे को ध्यान से देखना
इसके लाल रंग में करोडो का बलिदान देखना , 
हरे रंग में सबकी खुशहाली देख लेना , 
चक्र से सबकी प्रगति का मंत्र सीख लेना , 
ध्वज को थामे हुए अपने को देख लेना , 
आज़ादी का सही मतलब खुद ही समझ लेना।  



Tuesday, August 1, 2017

रेत की घडी




हसरतो का हौंसला तो देखो ,
एक पूरी तो दूसरी तैयार रहती हैं।  
भागते भागते इनके पीछे , 
पूरी ज़िन्दगी बीत जाती हैं।  

शायद यही ज़िन्दगी को गति देती हैं , 
कदमो को रुकने नहीं देती हैं।  
धीरे धीरे रेत की घडी की मानिंद , 
ज़िन्दगी हाथ से फिसलती जाती हैं।  

Friday, July 14, 2017

Let us live the life again


Let us live the life again,
Life is so beautiful,
Sorry for those days,
Which I had spent in vain.

Where is the mighty sorrow?
Where is the heavy pain?
I want to tell them,
They cannot defeat me now,
I will be happy and cherish life again.

Let us give colours to life again,
Make a rainbow once again.
Let us forget the past,
Start a fresh, from the scratch.

Wipe the tears , 
Lighten the heart,
Forget the pain ,
Let us live the life again.

Let us enjoy the sunshine,
Feel the moonlight ,
Enjoy the rain.
Let us live the life again.

Let us live the life again,
Life is so beautiful,
Sorry for those days,
Which I had spent in vain.






Saturday, July 8, 2017

चलो , आज कुछ लिखते हैं



चलो , आज कुछ लिखते हैं ,
आपबीती या कोरी कल्पना , 
कुछ प्रेरणादायी या फिर ,
कुछ चुभने वाला ही लिखते हैं।  

चलो , आज कुछ शब्दों को प्राण देते हैं , 
गीत बने या कहानी , 
कविता बने या न बने , 
अपनी भावनाओ को आकार  देते हैं, 
चलो , आज कुछ लिखते हैं।  

किसी को अच्छा लगे , न लगे , 
तुकबंदी बने या न बने , 
खत्म हो या न हो , 
कुछ शब्दों से अपने जज्बात बयां करते हैं , 
चलो , आज कुछ लिखते हैं।  

जो दिख रहा , जो घट रहा , 
अच्छा हो या बुरा , 
इसकी फिक्र दुसरो पर छोड़ते हैं , 
शब्दों से आज खेलते हैं , 
चलो , आज कुछ लिखते हैं।  

पंकितयाँ बने या न बने , 
अर्थ कुछ बने या न बने , 
व्याकरण की चिंता किये बगैर , 
आज कुछ अपने लिए लिखते हैं , 
चलो , आज कुछ लिखते हैं।  

Friday, July 7, 2017

एकाकार ,एकमत और एकजुट


एकाकार , एकमत और एकजुट ,  
गर किसी दिन हो गए भारतीय , 
तो फिर कौन हमें रोक सकता हैं , 
सवा अरब की हुंकार कौन सुन सकता हैं ।  

जरुरी हैं हम पहले अपना मन बनाये , 
जाति - क्षेत्र - धर्म- वर्ण - संप्रदाय से अपने को ऊपर उठाये , 
एक राष्ट्र - एक धर्म : भारतीयता को अपनाये , 
देश हित- सर्वोच्च हित : एकाकार , एकमत और एकजुट हो जाये।  

शताब्दियों का इतिहास गवाह हैं , 
हमने खुद से चोट खायी हैं , 
अपने अपने हित ऊपर रखकर , 
हमने गुलामी पायी हैं।  

इतिहास से सबक लेकर अब आगे बढ़ना हैं , 
" हम सब भारतीय हैं " - नारा लेकर चलना हैं , 
उठो , जागो - भारतीयों अब , निद्रा का त्याग करना हैं ,
"एक भारत - श्रेष्ठ  भारत "  बनाना हैं ।



Wednesday, July 5, 2017

आओ - कभी

आओ - कभी यूँ ही बतियाते हैं , 
कुछ तुम सुनाओ - कुछ हम सुनाते है।  

बहुत दिन हो गए - रूबरू नहीं हुए हैं, 
समय निकालो , साथ में चाय पीते है ,
यूँ तो फोन से बातचीत हो ही जाती हैं , 
मगर तुम्हारे संग चाय पीने की बात निराली हैं।  

अब समय न होने का बहाना मत बनाना , 
तुम न आ सकते तो हमें ही बुला लेना , 
काम तो रोज़ होंगे और  करने भी पड़ेंगे ,  
आओ , की जरा  फिर से बेबाक हँसेंगे।  

वर्षो बीत गए दिल खोल के हँसे नहीं , 
दिल की बात किसी से कहें नहीं , 
बहुत कुछ खोया - बहुत कुछ पाया ,
हर बार ज़िन्दगी का मतलब अलग समझ आया।  

आओ की जरा दिल का गुबार उड़ाते हैं , 
कुछ तुम सुनाना , कुछ हम सुनाते हैं।  

Monday, June 26, 2017

कशमकश

कशमकश रोज़ होती हैं , 
मेरी और मेरी ज़िन्दगी की मुलाकात रोज़ होती हैं।  

कुछ मेरे बहाने , 
कुछ उसके अफ़साने , 
कुछ मेरी शिकायते , 
कुछ उसके उलाहने , 


कुछ नए तजुर्बे , 
कुछ नयी सीखे , 
कुछ ख़ुशी के पल , 
कुछ अवसाद के क्षण , 

हमारी सुबह से शाम यूँ ही होती हैं ,
एक नए कल के इंतजार में हमारी रात कटती हैं।  

Wednesday, June 7, 2017

पर्यावरण बचाइए , पेड़ लगाइये

आओ , मिलकर दुनिया उजाड़ते हैं , 
पेड़ो को अंधाधुंध काटते हैं , 
पानी को प्रदूषित करते हैं , 
हवा में जहर घोलते है,  
आओ मिलकर दुनिया को ख़त्म करते हैं।  

बहुत कुछ तो कर चुके हम , 
थोड़ा और जोर लगाते हैं , 
कौन सोचे आने वाली पीढ़ी की , 
हम लोग तो आज में जीते हैं।  

उन्हें पानी मिले न मिले , 
हवा की शायद उन्हें जरुरत ही न पड़े , 
आओ हम  उनके लिए कंक्रीट के जंगल छोड़ते हैं।  

कही धधकेगी धरती , 
कही बर्फ का जमावड़ा होगा , 
न पानी होगा पीने को , 
हवा में जहर घुला होगा।    

ऑक्सीजन सिलिंडर पीठ में बंधा होगा , 
पानी की एक बूँद के लिए संग्राम होगा , 
अन्न उपजाने को जमीन का अकाल होगा , 
हमारी करनी को हमारी नयी पीढ़ी को भुगतना होगा ।  


( पर्यावरण बचाइए , पेड़ लगाइये) 

Monday, May 29, 2017

सफरनामा



कुछ पाने की खातिर निकला, 
पीछे बहुत कुछ छूट गया , 
ज़िन्दगी को बेहतर बनाने निकला , 
ज़िन्दगी का मतलब भूल गया।  

अब रोज़ फासले बढ़ते जा रहे हैं , 
हम मशीन बनते जा रहे हैं , 
जिस ज़िन्दगी को पाने निकले थे इक दिन , 
उससे दूर रोज़ जा रहे हैं।  

खुशियाँ मिल रही हैं जरूर , 
मगर न जाने क्यू फीकी सी लग रही हैं , 
शायद इस भागभागम में , 
"डायबिटीज " हो गयी हैं।  

Wednesday, May 24, 2017

हाइकू - भाग -३

धन , दौलत और जवानी ,
किसी की सगी नहीं होती ,
आज इसके घर , कल उसके घर। 
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दौलत और ताकत ,
वालो के लिए एक नसीहत ,
सिर्फ 'कर्म " जायेंगे साथ ऊपर। 
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ज़िन्दगी ,
सबसे क्षणभंगुर हैं ,
सिर्फ साँसो पर टिकी हैं। 
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कुदरत का एक ही वार ,
काफी हैं इंसान को ,
अपनी हद में रहने के लिए। 
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तंग आकर इस्तीफा लिखा  ,
तभी घर से फ़ोन गया ,

अगले महीने बहन की शादी तय हो गयी हैं।  
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Wednesday, May 17, 2017

हाइकू -२

"सब माया हैं "
कहने वाले गुरु जी ,
तिरछी निगाह से दानपेटी पर नजरे  गड़ाए थे। 
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भाई -बहन रिमोट के लिए झगड़ रहे थे ,
माँ ने बेटी से कहा ,
" भाई को दे दे ,तू खाना बना।  "

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कार ने रिक्शे को टक्कर मारी  ,
भीड़ कार पर खरोच देखकर ,
आगे बढ़ गयी। 
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बारात में सब खुश थे ,
दुल्हन के पिता पर दोहरी मार थी ,
प्यारी बिटिया और ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही थी। 
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बूढ़े माँ बाप के इकलौते बेटे को ,
“घर छोटा  हैंकहकर ,
बहु पति के साथ नए घर में चल दी।  

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दो भाइयो ने जमकर मेहनत की ,
कंपनी खड़ी की ,
उनके बेटो में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी। 

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साथ जीने मरने की कसम ,
प्रेमी की नौकरी जाते ही ,
स्वाहा हो गयी। 


Tuesday, May 16, 2017

हाइकू

फेसबुक पर दोस्त बने ,
व्हाट्सप्प पर खूब सपने सजे ,
मुलाकात हुई , रिश्ता ख़त्म।  
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भ्रस्टाचार  मिटा के ही दम लेंगे ,
कहने वाले नेताजी ,
ट्रैफिक पुलिस को सौ रुपए दे रहे थे ।
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नारी सशक्तिकरण पर भाषण देकर  ,
एक सज्जन घर पर अपनी बीवी को ,
बिटिया को कॉलेज न भेजने की सलाह दे रहे थे।  
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मैनेजर  जूनियर को समझा रहा था ,
घर बार सब भूल जाओ ,

दो घंटे से ऑफिस के फोन से घर बतिया रहा था।    

Friday, May 5, 2017

शब्द

शब्द -
प्यार भी हैं - तकरार भी,
शांति  भी हैं  संहार भी,  
आदर भी हैं - अपमान भी।

शब्द ,
गति भी है - ठहराव भी,  
उजाला भी है - अंधकार भी ,
भरोसा भी हैं , विश्वासघात भी।

शब्द -
ममता भी हैं - दुत्कार भी ,
प्रेरणा  भी हैं - तिरस्कार भी,
नम्रता भी हैं -  घमंड भी।

शब्द -
मित्र भी हैं- शत्रु भी,
मरहम भी है - घाव भी,
आकाश भी हैं - पाताल भी।

शुरू होती हैं बात इन्ही शब्दों से , फिर अंजाम तक पहुँचती हैं।
रिश्तो के बनने और बिगड़ने की इन्ही शब्दों से शुरुवात होती हैं।।

शब्दों की महिमा अपरम्पार हैं।  
कृष्ण बोले तो 'गीता' और दुर्योधन बोले तो 'महाभारत' हो जाती  हैं ।।   

Friday, April 21, 2017

शब्द और भावनाये



शब्दों और भावनाओ की आंखमिचौली जारी हैं , 
कभी शब्द -भावनाओ पर ,  
कभी भावनाये , शब्दों पर भारी हैं !

विषय बहुत , मेरा अल्प शब्दकोष  
बहुत जद्दोजहद हैं , 
मेरी लेखन यात्रा में यही शायद एक मुश्किल हैं ।  

शब्द मेरे संगी साथी अब , 
शब्द ही मेरे तीर - तलवार ,
उमड़ घुमड़ करते रहते , 
अद्भुत हैं शब्दों का संसार

ठहर जाओ कुछ पल अब , 
भावनाओ को दे दो आकार , 
मैं यायावर बन गया हूँ , 
तुम्हे ही देना हैं अब साथ।  

मिलकर शायद कुछ पंकितयों का , 
सृजन हम कर ही लेंगे , 
मेरी कलम से कुछ कविताये , 
बन कर जीवन में रस घोलेंगे।