Wednesday, May 17, 2017

हाइकू -२

"सब माया हैं "
कहने वाले गुरु जी ,
तिरछी निगाह से दानपेटी पर नजरे  गड़ाए थे। 
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भाई -बहन रिमोट के लिए झगड़ रहे थे ,
माँ ने बेटी से कहा ,
" भाई को दे दे ,तू खाना बना।  "

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कार ने रिक्शे को टक्कर मारी  ,
भीड़ कार पर खरोच देखकर ,
आगे बढ़ गयी। 
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बारात में सब खुश थे ,
दुल्हन के पिता पर दोहरी मार थी ,
प्यारी बिटिया और ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही थी। 
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बूढ़े माँ बाप के इकलौते बेटे को ,
“घर छोटा  हैंकहकर ,
बहु पति के साथ नए घर में चल दी।  

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दो भाइयो ने जमकर मेहनत की ,
कंपनी खड़ी की ,
उनके बेटो में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी। 

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साथ जीने मरने की कसम ,
प्रेमी की नौकरी जाते ही ,
स्वाहा हो गयी। 


Tuesday, May 16, 2017

हाइकू

फेसबुक पर दोस्त बने ,
व्हाट्सप्प पर खूब सपने सजे ,
मुलाकात हुई , रिश्ता ख़त्म।  
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भ्रस्टाचार  मिटा के ही दम लेंगे ,
कहने वाले नेताजी ,
ट्रैफिक पुलिस को सौ रुपए दे रहे थे ।
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नारी सशक्तिकरण पर भाषण देकर  ,
एक सज्जन घर पर अपनी बीवी को ,
बिटिया को कॉलेज न भेजने की सलाह दे रहे थे।  
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मैनेजर  जूनियर को समझा रहा था ,
घर बार सब भूल जाओ ,

दो घंटे से ऑफिस के फोन से घर बतिया रहा था।    

Friday, May 5, 2017

शब्द

शब्द -
प्यार भी हैं - तकरार भी,
शांति  भी हैं  संहार भी,  
आदर भी हैं - अपमान भी।

शब्द ,
गति भी है - ठहराव भी,  
उजाला भी है - अंधकार भी ,
भरोसा भी हैं , विश्वासघात भी।

शब्द -
ममता भी हैं - दुत्कार भी ,
प्रेरणा  भी हैं - तिरस्कार भी,
नम्रता भी हैं -  घमंड भी।

शब्द -
मित्र भी हैं- शत्रु भी,
मरहम भी है - घाव भी,
आकाश भी हैं - पाताल भी।

शुरू होती हैं बात इन्ही शब्दों से , फिर अंजाम तक पहुँचती हैं।
रिश्तो के बनने और बिगड़ने की इन्ही शब्दों से शुरुवात होती हैं।।

शब्दों की महिमा अपरम्पार हैं।  
कृष्ण बोले तो 'गीता' और दुर्योधन बोले तो 'महाभारत' हो जाती  हैं ।।   

Friday, April 21, 2017

शब्द और भावनाये



शब्दों और भावनाओ की आंखमिचौली जारी हैं , 
कभी शब्द -भावनाओ पर ,  
कभी भावनाये , शब्दों पर भारी हैं !

विषय बहुत , मेरा अल्प शब्दकोष  
बहुत जद्दोजहद हैं , 
मेरी लेखन यात्रा में यही शायद एक मुश्किल हैं ।  

शब्द मेरे संगी साथी अब , 
शब्द ही मेरे तीर - तलवार ,
उमड़ घुमड़ करते रहते , 
अद्भुत हैं शब्दों का संसार

ठहर जाओ कुछ पल अब , 
भावनाओ को दे दो आकार , 
मैं यायावर बन गया हूँ , 
तुम्हे ही देना हैं अब साथ।  

मिलकर शायद कुछ पंकितयों का , 
सृजन हम कर ही लेंगे , 
मेरी कलम से कुछ कविताये , 
बन कर जीवन में रस घोलेंगे।  

Friday, April 7, 2017

लेखन यात्रा



निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में ,
लिए शब्दों का पिटारा ,
भावनाओ की स्याही हैं ,
कलम ही मेरा सहारा।

लिखूंगा , और बेबाक लिखूंगा ,
गद्य लिखूंगा -पद्य लिखूंगा ,
कभी कल्पनाओ में गोते ,
और कभी सच को धार दूँगा।

कभी आपको हँसाऊंगा ,
कभी शायद पलके नम करूँगा ,
यायावर बनकर अब ,
ज़िन्दगी के और नजदीक पहुँचूंगा।

मिलेंगे अपने जैसे मुझे और कई ,
शब्दों का जाल बुनता रहूँगा  ,
जीवन के इस नए सफर में ,
शायद ज़िन्दगी का सार मिलेगा।

अच्छा लगे तो हौंसला देते रहिएगा ,
बुरा लगे तो भी बताइयेगा ,
इस यात्रा में हो सके तो ,
मेरा साथ देते रहियेगा।  

Thursday, April 6, 2017

शब्द कम

शब्द कम ,
भाव बहुतेरे ,
दिल ग़मगीन ,
देखकर मंजर ,
उमड़ घुमड़ रहे हैं विचार अनेक ,

आशा लिखूं ,
निराशा लिखूं ,
कुछ खोने का दर्द लिखूं ,
चंद सिक्के मिले जो उनकी खनक लिखूं ,

यादो का पिटारा खोलूँ ,
वर्तमान का सच लिखूं ,
या भविष्य का कुछ खाका बुनू ,

लिखना तो आदत हैं मेरी ,
बिना लिखे रह भी पाउँगा ,
आड़े तिरछे पिरोकर चंद शब्दो को ,
शायद अधूरी कविता ही लिख पाउँगा। 

फिर भी नाउम्मीदी में उम्मीद को तरजीह देता हूँ ,
घुप्प अँधेरे में प्रकाश की एक लकीर देखता हूँ ,
हर ज़िन्दगी के संघर्ष में ,
उसकी आँखों में एक नयी तस्वीर देखता हूँ। 

उस उदास सूरज को अस्त होते देखता हूँ ,
चाँद को अपनी मुंडेर से झांकते देखता हूँ ,
चहचाहट फिर उन पंछियो की ,
हर सुबह पहली किरण के साथ सुनता हूँ। 

ज़िन्दगी पर फिर रोज़ भरोसा सा होता हैं ,
निकल पड़ता हूँ घर से ,
दिन भर ज़िन्दगी की तमाम उलझने देखता हूँ ,
किसी के चेहरे पर सुकून ,
किसी के चेहरे पर मासूमियत ,
किसी को सब कुछ पा लेने की चाहत ,
किसी को 'कुछ होने पर भी' मस्त देखता हूँ। 

हर रोज़ नए किस्से ,
नई कहानियां ,
नए गीत बनते देखता हूँ। 

कैसे लिखूं और क्या क्या लिखूं ?
शब्द कम ,

भाव बहुतेरे।  

Saturday, March 25, 2017

किंकर्तव्यविमूढ़

मेरा देश बड़ी  मुश्किल में हैं , इधर जाये या उधर जाये ! 
बड़ा किंकर्तव्यविमूढ़ सा हैं !! 

विकास की दौड़ में सबसे आगे रहना चाहता है , 
फिर घर की हालात देखकर ठिठक जाता हैं , 

खुशहाल बनने की ललक दिल में हैं , 
किसानों की दशा देखकर सहम जाता हैं , 

बराबरी का हक़ सबको मिले , 
महिलाओ पर होते अत्याचारो से जार जार रोता हैं, 

पूरे विश्व में शांति दूत बनना चाहता हैं , 
पड़ोसियों की हरकतों से बार बार जख्म खाता हैं , 

संताने उसकी मुक्कमल जहां बनाये , 
बढ़ती बेरोजगारी - हथोड़े सा वार करता हैं , 

सबको तरक्की के अवसर मिले , 
भ्रस्टाचार और बेईमानी राह में रोड़ा बनता हैं , 

सर्वधर्म समभाव रहे , 
कुछ लोगो को ये अखरता हैं , 

उम्मीद अभी हैं उसे , 
सदियो से वजूद उसका यूँ ही  कायम नहीं  हैं , 

उठ खड़े होंगे जब ढाई सौ अरब हाथ इक दिन , 
दुनिया में उसके जैसा फिर कोई नहीं हैं।  

Sunday, March 19, 2017

चलो , देश बदलते हैं



चलो , देश बदलते हैं , 
थोड़ा हम और थोड़ा दुसरो को बदलते हैं। 

मंद गति से चल रही विकास यात्रा को , 
आओ ढाई सौ अरब हाथो से थोड़ा धक्का लगाते हैं, 
चलो  , देश बदलते हैं। 

हम सब पहले भारतवासी हैं , 
जात -पात - धर्म- ऊँच - नीच  की राजनीति से थोड़ा ऊपर  उठते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

जो पिछड़े , अशिक्षित , गरीब हैं , 
उनको सब मिलकर ऊपर उठाते हैं , 
चलो  , देश बदलते हैं। 

जो जहाँ हैं , वही से शुरू करते हैं , 
अपना काम मेहनत और  ईमानदारी से करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

क़र्ज़ बहुत बड़ा हैं देश का सब पर , 
थोड़ा इस क़र्ज़ को कम करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।

कराह रही अपनी भारत माता के, 
चेहरे पर मुस्कान लाते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

Friday, March 17, 2017

ये चुनाव कुछ कहते हैं



उत्तर में भगवा लहराया , 
गोवा में थोड़ा सा कमल मुरझाया , 
मणिपुर में कमल शुरुवात हुई , 
पंजाब ने हाथ पर भरोसा जमाया।  

मोदी लहर ने फिर दिखाया कमाल , 
पंक्चर हुई "साइकिल" - "हाथ" हुआ लाल, 
"हाथी" की बदल गयी चाल , 
बाकियो का किसी ने न पूछा हाल।  

सारे मिलकर मंथन कर रहे हैं , 
हार का दोष अब एक दूसरे पर  मढ़  रहे हैं , 
कई  ई वी एम् को शक से देख रहे  हैं ,
अपनी कथनी  करनी कोई देख नहीं रहे हैं।  

मतदाता फिर से चुपचाप हो गया हैं , 
नेताओ को सबक सीखा दिया हैं , 
पांच साल बाद ही अब जागेगा , 
किस्मत अपनी नेताओ को देकर अपने काम में लग गया है।  

Friday, February 17, 2017

मतदान बाद , गणना से पहले



नींद उडी हैं नेताओ की , 
ई वी एम  में बंद हो गयी किस्मत।  

कुछ अब सोच रहे जीत गए तो कैसे कमायेंगे ? 
हार गए तो पाँच साल कैसे बितायेंगे ? 

बड़ी कशमकश चल रही हैं , 
ज़िन्दगी नीरस सी लग रही हैं।  

वादों -इरादों के पोस्टरों को जला  दिया हैं , 
अब किसी के हाथ न पड़े , छुपा दिया हैं।  

हर मतदाता को शक की निगाह से देख रहे हैं , 
लिया तो इन्होंने  मुझसे से हैं , वोट पता नहीं - किसे दिया हैं ? 

नेताजी के कट नहीं रहे दिन रात , 
चेले अब भी दिलासा दे रहे हैं - जीतोगे बस आप।  

नेता जी ने अब विपक्षी उम्मीदवारों से भी दोस्ती कर ली हैं , 
अपने भाषणों में उसकी खिल्ली पर माफी माँग ली हैं।  

समझौता हो गया है - तुम जीते तो हमारा भी काम करना , 
हम जीते तो तुम हमें अपना भाई ही समझना।  

दोनों अब साथ साथ कहकहे लगाते हैं , 
चेले दोनों के साथ में अब पार्टी उड़ाते हैं।  

इन्तजार में दिन कट रहे हैं , 
ख्याली पुलाव रोज़ बन रहे हैं।

एक दिन का राजा - मतदाता ,
अपने काम धंधे , रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लग जाता हैं।  

Wednesday, January 4, 2017

देश जगना चाहिये , देश चलना चाहिए

 हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए ,
देश आगे बढ़ना चाहिए।  

चलो - उठो - भारत निर्माण करना हैं , 
हर हाथ में काम होना चाहिए।  

वक्त आ गया अब नए भारत का निर्माण करना होगा , 
हर भारतवासी को देश के लिए पहले सोचना होगा।  

अपने पुरखो की सींची धरा पर कर्म बीज बोना होगा , 
आने वाली पीढ़ी के लिए " स्वच्छ और निर्मल" भारत देना होगा।  

जात-पात , धर्म - अधर्म , ऊँच -नीच से ऊपर उठना होगा , 
हरेक नागरिक को अब " भारतीयता " को समझना होगा।  

हिमालय से कन्याकुमारी , कच्छ से अरुणाचल तक अब बिगुल फूँकना होगा , 
"विश्व गुरु " का गौरव फिर से वापस पाना होगा।  

सिंहनाद कर दे सवा अरब भारतवासी जिस दिन , 
दुनिया का कोना कोना थर्रा जायेगा। 

शर्त सिर्फ पहले यह हैं की , 
हमें अपने को अंदर से जगाना  होगा।  

अपनी ऊर्जा , सामर्थ्य और विवेक को , 
देश हित में लगाना होगा।  

हर हाल में अब देश जगना चाहिए , 
"विश्व विजय " की रणभेरी लेकर हर भारतवासी चलना चाहिए।  

Monday, January 2, 2017

खुद की , खुद से ........( 2017 की पहली कविता )

 



क्या हैं ? हम में वो जुनून और वो जज्बा की
हम खुद से मुकाबला करे
रोज़ अपने लिए कुछ पैमाने तय करे औरऔर उन पर खरा  उतरे
अपने लिए खुद नियम बनाये और उन पर अमल करे
क्यूंकि हमें दुसरो की नक़ल नहीं करनी
हमारा तो खुद से मुकाबला हैं
अपने को बेहतर से और बेहतर करने की जंग
हमारे ही भीतर तो हैं। 

हमें हमारी सोच बदलनी होगी
अपने पंखो को परवाज देनी होगी
खुला आसमान हैं ये जहाँ
क्षितिज की तलाश हमें खुद करनी होगी ,
  रुकना होगा , झुकना होगा 
अपने लक्ष्यों तक अपने जूनून से पहुचना होगा ,
 लगेगी थोडा देर भले ही ,
हार ने मानने का जज्बा रखना होगा
हिम्मत  रखनी पड़ेगी दुनिया बदलने की
हर हालात में मुस्कराये ये कलेजा रखना होगा। 

दुनिया हमें पागल कहे तो भी अपना रास्ता खुद चुनना होगा
सफलता और असफलता को बिना ध्यान में रखे
हमें  अविरल बहना होगा,  
भेडचाल में चल के बहुत देख लिया अब
अपने लिए खुद का  मुकम्मल जहाँ बनाना होगा ,
 अपने ज़िन्दगी कारवां को हमें
और बेहतर बनाना होगा।