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Wednesday, June 7, 2017

पर्यावरण बचाइए , पेड़ लगाइये

आओ , मिलकर दुनिया उजाड़ते हैं , 
पेड़ो को अंधाधुंध काटते हैं , 
पानी को प्रदूषित करते हैं , 
हवा में जहर घोलते है,  
आओ मिलकर दुनिया को ख़त्म करते हैं।  

बहुत कुछ तो कर चुके हम , 
थोड़ा और जोर लगाते हैं , 
कौन सोचे आने वाली पीढ़ी की , 
हम लोग तो आज में जीते हैं।  

उन्हें पानी मिले न मिले , 
हवा की शायद उन्हें जरुरत ही न पड़े , 
आओ हम  उनके लिए कंक्रीट के जंगल छोड़ते हैं।  

कही धधकेगी धरती , 
कही बर्फ का जमावड़ा होगा , 
न पानी होगा पीने को , 
हवा में जहर घुला होगा।    

ऑक्सीजन सिलिंडर पीठ में बंधा होगा , 
पानी की एक बूँद के लिए संग्राम होगा , 
अन्न उपजाने को जमीन का अकाल होगा , 
हमारी करनी को हमारी नयी पीढ़ी को भुगतना होगा ।  


( पर्यावरण बचाइए , पेड़ लगाइये) 

Monday, May 29, 2017

सफरनामा



कुछ पाने की खातिर निकला, 
पीछे बहुत कुछ छूट गया , 
ज़िन्दगी को बेहतर बनाने निकला , 
ज़िन्दगी का मतलब भूल गया।  

अब रोज़ फासले बढ़ते जा रहे हैं , 
हम मशीन बनते जा रहे हैं , 
जिस ज़िन्दगी को पाने निकले थे इक दिन , 
उससे दूर रोज़ जा रहे हैं।  

खुशियाँ मिल रही हैं जरूर , 
मगर न जाने क्यू फीकी सी लग रही हैं , 
शायद इस भागभागम में , 
"डायबिटीज " हो गयी हैं।  

Wednesday, May 24, 2017

हाइकू - भाग -३

धन , दौलत और जवानी ,
किसी की सगी नहीं होती ,
आज इसके घर , कल उसके घर। 
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दौलत और ताकत ,
वालो के लिए एक नसीहत ,
सिर्फ 'कर्म " जायेंगे साथ ऊपर। 
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ज़िन्दगी ,
सबसे क्षणभंगुर हैं ,
सिर्फ साँसो पर टिकी हैं। 
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कुदरत का एक ही वार ,
काफी हैं इंसान को ,
अपनी हद में रहने के लिए। 
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तंग आकर इस्तीफा लिखा  ,
तभी घर से फ़ोन गया ,

अगले महीने बहन की शादी तय हो गयी हैं।  
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Wednesday, May 17, 2017

हाइकू -२

"सब माया हैं "
कहने वाले गुरु जी ,
तिरछी निगाह से दानपेटी पर नजरे  गड़ाए थे। 
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भाई -बहन रिमोट के लिए झगड़ रहे थे ,
माँ ने बेटी से कहा ,
" भाई को दे दे ,तू खाना बना।  "

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कार ने रिक्शे को टक्कर मारी  ,
भीड़ कार पर खरोच देखकर ,
आगे बढ़ गयी। 
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बारात में सब खुश थे ,
दुल्हन के पिता पर दोहरी मार थी ,
प्यारी बिटिया और ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही थी। 
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बूढ़े माँ बाप के इकलौते बेटे को ,
“घर छोटा  हैंकहकर ,
बहु पति के साथ नए घर में चल दी।  

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दो भाइयो ने जमकर मेहनत की ,
कंपनी खड़ी की ,
उनके बेटो में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी। 

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साथ जीने मरने की कसम ,
प्रेमी की नौकरी जाते ही ,
स्वाहा हो गयी। 


Tuesday, May 16, 2017

हाइकू

फेसबुक पर दोस्त बने ,
व्हाट्सप्प पर खूब सपने सजे ,
मुलाकात हुई , रिश्ता ख़त्म।  
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भ्रस्टाचार  मिटा के ही दम लेंगे ,
कहने वाले नेताजी ,
ट्रैफिक पुलिस को सौ रुपए दे रहे थे ।
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नारी सशक्तिकरण पर भाषण देकर  ,
एक सज्जन घर पर अपनी बीवी को ,
बिटिया को कॉलेज न भेजने की सलाह दे रहे थे।  
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मैनेजर  जूनियर को समझा रहा था ,
घर बार सब भूल जाओ ,

दो घंटे से ऑफिस के फोन से घर बतिया रहा था।    

Friday, May 5, 2017

शब्द

शब्द -
प्यार भी हैं - तकरार भी,
शांति  भी हैं  संहार भी,  
आदर भी हैं - अपमान भी।

शब्द ,
गति भी है - ठहराव भी,  
उजाला भी है - अंधकार भी ,
भरोसा भी हैं , विश्वासघात भी।

शब्द -
ममता भी हैं - दुत्कार भी ,
प्रेरणा  भी हैं - तिरस्कार भी,
नम्रता भी हैं -  घमंड भी।

शब्द -
मित्र भी हैं- शत्रु भी,
मरहम भी है - घाव भी,
आकाश भी हैं - पाताल भी।

शुरू होती हैं बात इन्ही शब्दों से , फिर अंजाम तक पहुँचती हैं।
रिश्तो के बनने और बिगड़ने की इन्ही शब्दों से शुरुवात होती हैं।।

शब्दों की महिमा अपरम्पार हैं।  
कृष्ण बोले तो 'गीता' और दुर्योधन बोले तो 'महाभारत' हो जाती  हैं ।।   

Friday, April 21, 2017

शब्द और भावनाये



शब्दों और भावनाओ की आंखमिचौली जारी हैं , 
कभी शब्द -भावनाओ पर ,  
कभी भावनाये , शब्दों पर भारी हैं !

विषय बहुत , मेरा अल्प शब्दकोष  
बहुत जद्दोजहद हैं , 
मेरी लेखन यात्रा में यही शायद एक मुश्किल हैं ।  

शब्द मेरे संगी साथी अब , 
शब्द ही मेरे तीर - तलवार ,
उमड़ घुमड़ करते रहते , 
अद्भुत हैं शब्दों का संसार

ठहर जाओ कुछ पल अब , 
भावनाओ को दे दो आकार , 
मैं यायावर बन गया हूँ , 
तुम्हे ही देना हैं अब साथ।  

मिलकर शायद कुछ पंकितयों का , 
सृजन हम कर ही लेंगे , 
मेरी कलम से कुछ कविताये , 
बन कर जीवन में रस घोलेंगे।  

Friday, April 7, 2017

लेखन यात्रा



निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में ,
लिए शब्दों का पिटारा ,
भावनाओ की स्याही हैं ,
कलम ही मेरा सहारा।

लिखूंगा , और बेबाक लिखूंगा ,
गद्य लिखूंगा -पद्य लिखूंगा ,
कभी कल्पनाओ में गोते ,
और कभी सच को धार दूँगा।

कभी आपको हँसाऊंगा ,
कभी शायद पलके नम करूँगा ,
यायावर बनकर अब ,
ज़िन्दगी के और नजदीक पहुँचूंगा।

मिलेंगे अपने जैसे मुझे और कई ,
शब्दों का जाल बुनता रहूँगा  ,
जीवन के इस नए सफर में ,
शायद ज़िन्दगी का सार मिलेगा।

अच्छा लगे तो हौंसला देते रहिएगा ,
बुरा लगे तो भी बताइयेगा ,
इस यात्रा में हो सके तो ,
मेरा साथ देते रहियेगा।  

Thursday, April 6, 2017

शब्द कम

शब्द कम ,
भाव बहुतेरे ,
दिल ग़मगीन ,
देखकर मंजर ,
उमड़ घुमड़ रहे हैं विचार अनेक ,

आशा लिखूं ,
निराशा लिखूं ,
कुछ खोने का दर्द लिखूं ,
चंद सिक्के मिले जो उनकी खनक लिखूं ,

यादो का पिटारा खोलूँ ,
वर्तमान का सच लिखूं ,
या भविष्य का कुछ खाका बुनू ,

लिखना तो आदत हैं मेरी ,
बिना लिखे रह भी पाउँगा ,
आड़े तिरछे पिरोकर चंद शब्दो को ,
शायद अधूरी कविता ही लिख पाउँगा। 

फिर भी नाउम्मीदी में उम्मीद को तरजीह देता हूँ ,
घुप्प अँधेरे में प्रकाश की एक लकीर देखता हूँ ,
हर ज़िन्दगी के संघर्ष में ,
उसकी आँखों में एक नयी तस्वीर देखता हूँ। 

उस उदास सूरज को अस्त होते देखता हूँ ,
चाँद को अपनी मुंडेर से झांकते देखता हूँ ,
चहचाहट फिर उन पंछियो की ,
हर सुबह पहली किरण के साथ सुनता हूँ। 

ज़िन्दगी पर फिर रोज़ भरोसा सा होता हैं ,
निकल पड़ता हूँ घर से ,
दिन भर ज़िन्दगी की तमाम उलझने देखता हूँ ,
किसी के चेहरे पर सुकून ,
किसी के चेहरे पर मासूमियत ,
किसी को सब कुछ पा लेने की चाहत ,
किसी को 'कुछ होने पर भी' मस्त देखता हूँ। 

हर रोज़ नए किस्से ,
नई कहानियां ,
नए गीत बनते देखता हूँ। 

कैसे लिखूं और क्या क्या लिखूं ?
शब्द कम ,

भाव बहुतेरे।