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Friday, July 23, 2010

तीसरा पड़ाव.........इच्छा का कोई अंत नहीं

" इच्छा का कोई अंत नहीं,

थोड़े से अब किसी का पेट भरता नहीं,

जो कुछ हैं उसमे अब किसी को संतोष नहीं,

और ज्यादा , ज्यादा की इस दौड़ का कही कोइ अंत नहीं.



जो हैं शायद वो कम हैं , और चाहिए !

मगर कितना चाहिए किसी को इसका पता नहीं.

सबकी की परेशानियों का शायद मूल यही.

और......... और......की इस अंधी दौड़ में,

ज़िन्दगी हर वक़्त सिसकती रही. "

3 comments:

  1. बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

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  2. सटीक लिखा है...सुन्दर भाव

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  3. really very nice poem and its true...

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