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Thursday, November 11, 2010

अब भी मेरे गाँव में ऐसा होता है....................

इस दिल्ली शहर में घर से दो मिनट भी निकलते हैं,

तो पहले ताला चाबी दूंदते हैं.

मेरे गाँव में हम दो दिन के लिए बाहर जाते हैं ,

तो पडोसी चाची को जरा घर देख देना कह खुला छोड़ जाते हैं.

इस शहर में पिछले दो सालो से रहते हुए भी में अपने पडोसी को नहीं जानता,

मेरे गाँव में अब भी कोई नया आ जाए तो,

उसे कोई भैया, कोइ चाचा , तो कोई ताऊ कह कर रिश्ता जोड़ते हैं.

यहाँ शहर में घूमने के लिए हम पार्क दूंदते हैं,

मेरे गाँव में हम कोई नया घर बने तो खुश होते हैं.

इस शहर में १०० मीटर भी जाना तो हम रिक्श्वा वाले को दूंदते हैं,

मेरे गाँव में हम कई किलोमीटर पैदल ही नाप लेते हैं.

इस शहर में बिना ए सी और पंखे के गुजारा नहीं होता,

मेरे गाँव में कोई घर पंखा लगाये तो हम हंसते हैं.

इस शहर में अब ओवेन में खाना बनाते हैं,

मेरे गाँव में चूल्हे में अब भी रोटिया सेंकते हैं.

इस शहर में स्कूल फाईव स्टार हो गए हैं,

मेरे गाँव की पाठशाला में अब भी बच्चे दरी में बैठ कर ख्वाब बुनते हैं.

इस शहर में पेड़ खोजने से मिलते हैं,

मेरे गाँव में अब भी जंगल में जाने से डरते है.

इस शहर में थोडा सर्दी जुकाम भी हो जाये तो डॉक्टर के पास जाते हैं.

मेरे गाँव में अब भी काडा पीकर काम चलाते हैं.

इस शहर से लोग मेरे गाँव में ट्रेकिंग करने के लिए जाते हैं,

मेरे गाँव के लड़के उच्चे उच्चे पहाड़ो को बात बात में नाप आते हैं.



( मैं मूलत उतराखंड के अल्मोड़ा जिले के छोटे से गाँव कोटूली से तालुक रखता हूँ जो जीविका चलाने के लिए दिल्ली में रह रहा हूँ.)

1 comment:

  1. lekin itna kuch hone ke bawjood hum , jivika chalane ke liye delhi jaise shehr mein hi aate hain , jnha sirf log professionalism ke alwa koi baat nahi jante , jnha log sanednheen hain , jo sirf paise ki bhasha jante hain

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