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Monday, April 26, 2010

मैं और मेरी ज़िन्दगी .....................

ज़िन्दगी और मेरी कहासुनी चलती रहती हैं,
कभी वो मुझे कोसती हैं , कभी में उसको.
कभी वो मुझे शाबाशी देती हैं, कभी मैं उसको.
लुकाछिप्पी  का खेल हम बरसो से खेल रहे हैं.
न वो हारने को तैयार और न मैं.
कभी वो आगे निकल जाती हैं तो कभी मैं.
मिल ही जाते हैं थोडा दूर चल कर हम फिर,
कभी वो मेरा मुहं चिडाती हैं  और कभी मैं.
दोनों को पता हैं साथ साथ ही चलना हैं हमें,
एक के बिना दूसरे का गुजारा नहीं हैं,
फिर भी एहमियत समझाने को ,
कभी वो आगे निकल जाती हैं कभी मैं.
दोनों की मंजिल एक हैं फिर भी,
कभी वो जल्दबाजी दिखाती हैं और कभी मैं.
थक कर जब हम चूर हो जाते हैं कभी,
कभी वो मुझे संभालती हैं और कभी मैं.
इसी तरह से फिसलता हैं वक़्त हमारी मुट्ठी से,
कभी वो बेबसी से मेरा मूंह ताकती और कभी मैं.

Wednesday, April 21, 2010

कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं..............

कौन कहता हैं दुनिया बुरी हो गयी हैं, अब भी इंसानियत बची हुई हैं.


हर गली चौराहे पर इमान का झंडा बुलंद किये कुछ लोग अब भी  खड़े हैं .

थोडा भ्रस्टाचार , थोडा बैमानी , थोड़ी घूसखोरी और थोडा अत्याचार हैं तो क्या हुआ , अब भी इस दुनिया में बहुत ईमानदार बचे हुए हैं.

माना अब रावणों की तादाद ज्यादा हो गयी हैं , कुम्भ्कर्नो की रात लम्बी हो गयी हैं .
मगर अब भी कुछ राम बचे हुए हैं , धनुष बाण लिए खड़े हैं .

रिश्ते - नाते बैमानी हो गए हैं , हर तरफ स्वार्थ का राज हो गया हैं.
मगर अब भी कुछ भरत चुपचाप जी रहे  हैं.

माना की हर तरफ घुप्प अँधेरा छाया हैं , रौशनी की दूर दूर तक उम्मीद नहीं हैं .
मगर अब भी कुछ लोग दीये लेकर हर तरफ बिखरे पड़े हैं .

ना उम्मीदी का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ हैं . बस थोडा अँधेरा घना हो गया हैं .
बस अब जल्द ही ये अँधेरा छटने वाला हैं . सुबह की पहली किरण छटा बिखेरने को तैयार हैं.

मशाल थामे कुछ लोग आगे बड़ चले हैं, ये अँधेरा कटने वाला हैं .
आ जाओ की अब तुम्हारा साथ चाहिए क्यूंकि इस कारवां का सफ़र बड़ा लम्बा हैं .

Wednesday, April 14, 2010

सांझ ....................


जन्म लिया एक घर में, उसको खुशियों से आबाद किया.

बचपन गुजरा जैसे तैसे , घरवालो को परेशान न किया.

सोचा आगे सब कुछ अच्छा होगा, फिर एक दिन अपना मायका छोड़ा.


पहुची एक नए जहाँ में, सबको फिर अपना समझा.

छोड़ दिए सब अपने सपने , किसी के सपनो को अपना लिया.

कब बीत गयी जवानी , पता भी नहीं चला.

जिंदगी की उलझनों में खुद को भुला दिया.

अपना परिवार , अपने बच्चे - जीवन इन सब पर कुर्बान कर दिया.

जीवन कब बीत गया, पता भी न चला.

जिनके लिए जीवन अर्पण किया, एक एक कर सब छोड़ चले .

जीवन के इस साँझ में मुझे अकेला कर गए.

आज उस डूबते सूरज को निहारती हूँ,  ज़िन्दगी की साँझ में कितनी अकेली रह गयी हूँ.

Tuesday, April 13, 2010

पहाड़ो की सैर ...... ( Let us Visit the Hills)

वो सामने हिमालय हैं, दूर दूर तक बिखरा नीला आसमान.

बादलो से अठखेलिया करते ऊँचे पर्वत, फल फूलो से लदे ये उपवन.

कल कल करती बहती नदिया और हरे भरे पेड़ो से भरे ये जंगल.

झरनों से बहता निर्मल पानी , अमृत जैसा इनका जल.

बहती ठंडी हवा देखो, करती मन को कितना शीतल.

बाहे खोले बुला रहा ये सुन्दर मंजर, बिना तुम्हारे ये सब बेकार.

माना की तुम बहुत व्यस्त हो, कुछ कमाने के चक्कर में मस्त हो.

फिर भी फुर्सत के कुछ पल तो निकालो , आकर मेरी गोद में खेलो.

फिर कहोगे " अगर स्वर्ग हैं धरती पर, तो हैं वो यही पर."

 
( यह कविता समप्रित हैं उन सब पहाड़ी निवासियों को जो रोज़ी रोटी के चक्कर में शहरो में बसे हैं और उन लोगो को जो पहाड़ो से प्रेम करते हैं )

Monday, April 12, 2010

अगले जन्म मोहे बी पी ओ की नौकरी मत दीजियो..........

घर वाले जब सोते हैं, मेरी सुबह तब होती हैं.
रात के अँधेरे में मेरी शिफ्ट शुरू होती हैं.
उल्लुओ की तरह रात रात बहर जागकर, हालत मेरी खस्ता हो गयी हैं.
अपने घर पर ही में पराया हो गया हूँ, पड़ोसियों के लिए में गुमशुदा हो गया हूँ.
फ़ोन पर बात करते करते अब कान भी घरघराने लग गए हैं.
अंग्रेजो से बात करते करते हिंदी भी भूल गए हूँ.
क्या करू ! इस नौकरी का, मम्मी की रोटी में भी बर्गर की खुशबू ढूँढने लगा हूँ.
अर्ज़ सुन ले ! भगवन मेरी - अगले जन्म इन बी पी ओ से छुटकारा दिला देना.
दिन की किसी नौकरी का मेरे लिए इंतज़ाम कर देना.

( यह कविता समप्रित हैं सभी लोगो को जो कॉल सेंटर में नौकरी करते हैं)

Friday, April 9, 2010

बेबसी ........

तंग आकर एक दिन उसने इस्तीफा लिख ही लिया,
चदने लगा ऑफिस की सीडिया ,
तब उसे अपने बच्चे की कही बात का ख्याल आया, "पापा मुझे इस महीने साइकिल दिला देना."
और माँ की कही बात याद आई, "बेटा ! तू ही सहारा हैं अब घर का" !
पत्नी का वो ताना याद आया, " कब खरीद के दोगे एक वाशिंग मशीन ?"
फिर बहन की शादी का ख्याल आया.
उठे कदम फिर रुक गए, ऊपर बढते कदम ठिटक गए !
वो वापस अपनी कुर्सी पे आ गया, फाईल्स  की ढेर में फिर खो गया.

Thursday, April 8, 2010

छोड़ आये हम वो गलियाँ ...............................

आँगन छूटा, गाँव छूटा , पीछे छूटा वो परिवेश !
छूट गयी बचपन की वो गलियाँ, जो गूंजता था हर रोज़ !
पीछे रह गयी सब वो यादों,  जब हम चल दिए थे इक रोज़ !
बेफिक्री के वो दिन अब कितने आते याद,
काश ! फिर लौट आते वो दिन जहाँ सिर्फ हमारा था राज !
चंद कागज़ के टुकडो को इकट्ठा करने के लिए,
क्या क्या खो दिया हमने आज आता हैं याद !
कहती हैं वो गलियाँ आज, आ जाओ मेरे प्यारो ,
फिर से करो हमें आबाद !
हम नहीं बदले आज भी, तुम कितने बदल गए हो आज !