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Sunday, April 17, 2011

अहम ब्रह्म्ष्मी .........

जब भी तू हो उदास, मन भर आये होकर कोई बात.


दुनिया जब बेगानी सी लगने लगे,

अपने से जब थोडा भरोसा डगमगाने लगे,

हर चीज़ जब बुरी लगने लगे, किसी काम में मन न लगे,

तसल्ली से किसी एकांत जगह पर बैठ ,

बस थोडा आँख से आंसू निकाल,

और फिर जब थोडा मन हल्का हो जाए,

तो एक मंत्र रख याद,

दस बार खुद से " अहम ब्रह्म्ष्मी " बोल डाल,

खुद को खुदा की एक सम्पूर्ण रचना मान,

याद कर वो लोग, जो बिना कुछ होते हुए भी हंस कर जी रहें हैं,

याद कर वो लोग, जो तेरे पीछे खड़े हैं.

याद कर अपनी माँ का तेरे लिए वो लाड प्यार,

याद कर पिता का वो डांट में तेरे लिए आशीर्वाद,

तू खुद में पूरा हैं , तुझमे में कोई कमी नहीं हैं,

बस थोडा हालातो का धोखा हैं, और समय नहीं तेरे साथ.

मगर ये भी कितने पल ठहरेगा , तेरे सोचने मात्र से ही काफूर हो जायेगा,

फिर से तू खड़ा होगा, लेकर अपने सपनो को साथ.

चल- चला - चल तेरे आगे सारा नीला आकाश.

1 comment:

  1. That is so nice Sir, your every poem gives me something new every time.

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