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Monday, September 19, 2011

ये कैसी उलझन .......



बॉस कहता हैं ऑफिस तेरी पहली प्राथमिकता हैं,

क्यूंकि तेरी रोज़ी रोटी इसी से चल रही हैं.

आठ घंटे तो दिखाने के हैं, बाकी के घंटे काम करने से ही आगे दरवाजे खुलने हैं.

घर पर बीवी कहती हैं ,

घर तेरी पहली प्राथमिकता हैं , घर पर ज्यादा समय देना ज्यादा मह्त्वपूर्ण हैं.

दिमाग घनचक्कर की तरह घूम रहा हैं,

किस चीज़ को पहली प्राथमिकता दू,

उलझन बड़ी हैं, नौकरी और घर के बीच में ज़िन्दगी फंसी पड़ी हैं.

इस विषय पर लिखने को तो बहुत कुछ हैं मगर, यहाँ भी असमंजस हैं.


किसी एक पलड़े को भारी करने से अगले का अपने ऊपर ही गिरने भय हैं.

आप लोग खुद ही समझदार हैं ,

between the lines पढने में माहीर हैं.

खुद ही मर्म को समझ लीजियेगा,

अगर कोई रास्ता सूझे तो सबके साथ साझा जरुर करियेगा.

Sunday, September 18, 2011

डोर..

थामे डोर ज़िन्दगी की चले थे किस ओर ,


समय के थपेड़ो ने पंहुचा दिया किस ओर,

कुछ अपनी करनी और कुछ भाग्य के सहारे ,

देखो कहाँ से कहाँ पहुच गए हम लोग.

Saturday, September 17, 2011

मैं कौन हूँ .............

मैं जब पैदा होता हूँ, तो मेरे माँ-बाप मुझे अपने सपनो का सौदागर समझते हैं.


मैं थोडा बड़ा होता हूँ, तो स्कूल की फीस भरने के लिए माँ बाप को उदास देखता हूँ.

जैसे तैसे स्कूल से निकल कर कोलेज पहुचता हूँ, तो नए कपड़ो को तरसता हूँ.

माँ बाप की दो रोटी के जुगाड़ की कोशिशो को समझता हूँ.

उनके सपनो को पूरा करने के लिए मेहनत करता हूँ.

सरकारी नौकरी लग जाए तो परिवार को सहारा मिले,

सोच सोच कर हर फॉर्म भरता हूँ.

फिर थक हार कर प्राइवेट नौकरी की राह पकड़ता हूँ.

फिर हर साल नौकरी बदले तो कुछ पैसे मिले,

कही एक जगह टिक कर नहीं रहता हूँ.

बस के धक्के , बॉस की डांट और चलो कल अच्छा हो जायेगा,

की कशमकश में जवानी गुजारता हूँ.

थोडा जमने की कोशिश में शादी करता हूँ,

माँ बाप के सपनो को छोड़ अपनी दुनिया बसाने की कोशिश करता हूँ.

ऑफिस के टेंसन घर पर ले जाकर बीवी से झगड़ता हूँ.

बच्चो के आगमन से फिर नयी कल्पनाये बुनता हूँ.

उनके लिए रोटी , कपडा और मकान की जुगत बिठाने में लग जाता हूँ.

अपने आदर्श , अपनी कुंठाए गाहे बगाहे इज़हार कर लेता हूँ.

कभी लाइनों में लगे लोगो से , या कभी बस के धक्के मुक्को में ,

अपने गुस्से का इज़हार करता हूँ.

कभी किसी नेता की रैली में या कभी अन्ना हजारे के समर्थको ,

मैं ही शामिल होता हूँ.

जब अन्याय मेरे साथ होता हैं, मैं लोगो को उनके साथ न देने के लिए कोसता हूँ.

जब सड़क के किसी के साथ अन्याय होता हैं तो चुपचाप मैं ही खिसकता हूँ.

मैं कौन हूँ .............मैं आम आदमी हूँ.

Sunday, September 11, 2011

खुदी को साबित.........

इतेफाक से मिली ये ज़िन्दगी, खुदा की नियामत हैं

खुदी को साबित करने का एक अवसर हैं.


निशाँ इतने छोड़ जाने हैं इस धरा पर,

लोग कहे की हाँ ! आया था एक आदमी ज़मी पर.

ज़िन्दगी को जीना हैं इस तरह से,

जिंदगानी से कोई शिकवा न रह जाए,

लोगो का इतना काफिला हो रुखसती के समय की,

खुदा को भी तुझ पर गुमान हो जाए.

यूँ तो अरबो जीवन यहाँ हैं, लेकिन कुछ ऐसा कर गुजर,

की जब पलटे तू ही पन्ने अपने जीवन की किताब के,

फक्र से तेरा सीना चोडा हो जाये.