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Wednesday, March 21, 2012

समय का चक्र ....


हर सुबह इठला के कहती हैं
लो, मैं फिर गयी तुम्हारे लिए
लेकर एक नयी दिन की सौगात
अब ये तुम पर हैं
कैसे करोगे आज का तुम इस्तेमाल
दोपहर कहती हैं अभी भी वक़्त हैं
सूरज अभी उफान पर हैं
दिन की जवानी हैं
उठा ले कदम करने अपने सपने साकार
शाम आते आते सबक दे जाती हैं
आज का दिन गया अब
कल का फिर करना इंतज़ार
रात अपनी कालिमा ओडे
हमें करा  जाता हैं याद हमारी औकात.  
यु ही हर रोज़ हमें ज़िन्दगी का एक सन्देश दे जाता हैं
हम बड़ते चलते हैं
दिन , महीने , साल और दशक
यू ही बनते चले जाते हैं
दिन अगर अच्छा बीता तो हम खुश हो जाते हैं, 
दिन अगर बुरा रहा तो चलो कट गया कह कर सो जाते हैं. 
समय का चक्र यूँ ही चलता रहता हैं, 
फिर एक दिन हम अपनी खाते की ज़िन्दगी काट के, 
अनजान सफ़र की तरफ निकल जाते हैं. 


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