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Friday, June 29, 2012

आत्म -मंथन

रोज़मर्रा की उलझनों से , एक दिन थोडा वक्त अपने लिए निकाला.
थोडा आत्म-मंथन के लिए बैठा , तो अपने आपको को एक बदला हुआ इंसान पाया. 
वो उसूल , वो आदर्श , वो लक्ष्य , वो जूनून - जो देखे थे कभी लड़कपन में, अपने आपको उनसे बहुत दूर पाया.
अब इसे मजबूरी कह ले या  हालातो का सितम , कैसे - कहाँ - कब ये सब हुआ पता ही नहीं चल पाया. 
सोचने को मजबूर हुआ की - चले थे किस ओर हम  , कहाँ पहुच गए. 
पकड़ा तो था हमने नदी का वो किनारा , दुसरे किनारे कैसे पहुच गए. 
तारीखे बदलती गयी , साल न जाने कहाँ चले गए. 
हम भी रोज़ की आपा - धापी में खुद को जैसे भूल गए. 
दिल के जज्बातों को किनारे कर दिया, दिमाग ने हमें दुनिया के पीछे भगा दिया. 
लग गए हम भी वही सब इकठ्ठा करने , दुनिया ने जिसे सफलता का पैमाना बना दिया. 
अब अपने लिए वक्त की कमी हो गयी हैं, क्यूंकि दुनिया को दिखाने की हमें ज्यादा पड़ी हैं. 
दिल अब भी कहता हैं जो बीत गया , वो गया.  अब भी सचेत हो जा. 
मिली हैं एक बार जो ये ज़िन्दगी , उसको कुछ मतलब दे जा. 
जीवन  के उतरार्ध  में कभी जब  खोले  अपने  किताब के पन्ने हम , हमें अपने आप पर फक्र हो जाये. 

बस .. यूँ ही ख्याल आया


सफ़र बहुत तय करना हैं अभी, अभी तो कुछ ही मीलो के पत्थर नापे हैं. 
आगे कितने और मील चलना हैं,इसका कोई पता नहीं. 
छोड़ते चले अपने निशाँ , जहाँ से भी गुजरे अपना कारवां. 
सफ़र ज़िन्दगी का हैं, आज यहाँ हैं , कल कहाँ?
जहाँ भी आज हैं , जिन्दादिली होनी चाहिए . 
कल अगर उधर न भी हो हम, कमी खलनी  चाहिए. 
हमें तो बढते रहना हैं , ज़िन्दगी एक जगह रुक जाये तो कोई काम की नहीं. 

Thursday, June 7, 2012

पलायन .....


उच्चे उच्चे पहाड़, बीच से बहती नदी, 
ताज़ी हवा और वीराने में कूकती चिड्याएं 
दूर दूर तक मनोरम द्रश्य , 
न कोई कोलाहल , न कोई भागमभाग, 
न गाडियों का रेला और दूर दूर बिखरा गाँव. 
मगर न जाने क्यों इन सबको नजर लग गयी हैं, 
हर गाँव सूना सूना सा हैं, 
अपने बच्चो के लौटने का कब से इन्तेजार कर रहा हैं, 
उस गाँव के लाल पैसे कमाने शहर गए हैं, 
अपने पीछे बुड़े माँ बाप छोड़ गए हैं, 
बीवी हर रोज़ आस में जीती हैं, 
बच्चे पापा के इन्तेजार में हर रूकती गाड़ी से आस लगाये रहते हैं. 
और गाँव का बेटा शहर की गर्मी में झुलस रहा होता हैं, 
एक एक पैसे की खातिर हर रोज़ मर रहा होता हैं, 
जब कभी फुर्सत मिलती हैं उसे शहर की दौड़ भाग से , 
अपनी गाँव की याद में जल रहा होता हैं. 
कब ये पहाड़ अपने श्राप से मुक्त होंगे , 
इसके अपने बच्चे कब इसके अपने होंगे , 
इसके रास्ते अपने बच्चो के पदचाप के लिए तरस गए हैं, 
कब वो बुड़े माँ बाप शहर से आने वाली हर गाड़ी को ताकना बंद करेंगे , 
कब  उस पत्नी का वियोग ख़त्म होगा, 
कब बच्चे अपने पिता को हर रोज़ देखेंगे, 
कब अपने बच्चो के पैरो की धमक से ये पहाड़ फिर  गूंजेंगे ,
कब इसके बच्चे इसे छोड़ कर कभी नहीं जायेंगे.