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Sunday, September 30, 2012

जिन्हें जल्दी थी , वो चले गए

सुबह स्टैंड पर बस के लिए खड़ा था, 
एक ट्रक गुजरा और उसके पीछे लिखा था, 
" जिन्हें जल्दी थी , वो चले गए.
बार बार होर्न दे कर वक्त जाया न कीजिये ."  
बस आने में थोडा समय था , 
मैं उस विचार में खो गया, 
कितना अच्छा विचार था वो , 
लाख टके की बात थी उसमे , 
ज़िन्दगी के लिए एक नया सबक दे रहा था , 
" जिन्हें ज़ल्दी थी , वो चले गए " 
हम आराम से हैं , शायद इसलिए इन्तजार कर रहे थे. 
कभी कभी कुछ अच्छा पड़ने के लिए किताबो के सहारे की ही जरुरत नहीं पड़ती , 
अपने दिलो-दिमाग को खुला रखिये , 
हर जगह ज्ञान की दूकान खुली पड़ी हैं. 
बस याद रखिये , " जिन्हें जल्दी होती हैं , वो चले जाते हैं . 
सुकून से जीने वाले ही जीवन का लुफ्त उठाते हैं."  

Wednesday, September 26, 2012

एक सेल्समेन की कहानी, मेरी जुबानी .........

बॉस ने बुलाया उसको और कहा, 
" तुम्हारा ध्यान नहीं हैं काम पर आजकल , 
सब टार्गेट फेल हो रहे हैं . 
नए कस्टमर तुम जोड़ नहीं रहे हो, 
पुराने तुम्हारे से माल खरीद नहीं रहे हैं, 
तुम कर क्या रहो हो आजकल " 
उसने जवाब दिया , 
" पुराने कस्टमर तो इसलिए आर्डर नहीं दे रहे हैं क्यूंकि , 
पहले तो हम उनको टाइम पर माल नहीं देते 
और देते हैं तो क्वालिटी का हमारे कोई भरोसा नहीं होता , 
रही बात नए कस्टमर की, रोज़ नए नए कस्टमर के पास जाता हूँ, 
अपनी कंपनी का नाम लेता हूँ तो वो भड़क जाते हैं , 
स्कीमे चलाते हो - अपने प्रोडक्ट के साथ टेडी बीयर देते हो. 
रही बात टार्गेट की , आपने पूरी टीम का टार्गेट मेरे ऊपर लाद दिया हैं , 
पूरा हो गया तो आपकी जय जय कार होती हैं , 
इन्क्रीमेंट आपका बढ़िया होता हैं और मैं सिर्फ ताकता रहता हूँ. 
रही बात ध्यान की, वो मैं भी लगाना चाहता हूँ. 
मगर न आप लगाने देते हो और न घर वाले , 
आप एक काम को पूरा करने नहीं देते हो की , 
अगला पकड़ा देते हो , 
घर वाले कहते हैं नौकरी बदल ले , 
इतना काम के बदले तुझे देते क्या हैं  ? 
तेरे दोस्त तुझसे ज्यादा कमाते हैं ." 
रूआंसा सा होकर वो केबिन से निकला , 
थोडा संतोष था की जो बात इतने दिलो से कह नहीं पा रहा था, 
आज कम से कम बॉस को बता तो दी, 
पता हैं होना कुछ भी नहीं हैं , 
मगर अपने दिलोदिमाग से थोडा बोझ शिफ्ट तो हुआ. 
उधर बॉस भी सोच रहा था , 
कितनी सही बात कह गया वो, 
मेरी तो हालात उससे  बदतर हैं ,
वह अपनी भड़ास मुझ पे निकाल गया , 
अब मैं किस पे  निकालू , सोच रहा था.  

Monday, September 24, 2012

ज़िन्दगी और मैं ....

सन्डे को थोडा फुर्सत थी, तो थोडा अलसा रहा था. 
पता नहीं कहाँ से ये ख्याल आया , 
जैसे मेरी ज़िन्दगी मेरे सामने आ गयी हो , 
और पूछ रही हो ," बता, मेरा हिसाब किताब ,
इतने साल जो तुने मेरे गवां दिए हैं , 
क्या क्या किया बता तू आज." 
शरीर में सिहरन सी मच गयी , 
और बोला, " सन्डे हैं आज , 
थोडा सुस्ता लूं मैं , 
कल करेंगे बात " 
ज़िन्दगी बोली , " बाकी दिन तो बहुत बहाने है तेरे पास, 
कभी इसका टेंसन और कभी गिनाएगा और बहुत सारे कारण, 
फिर कह देगा बहुत सारे काम हैं मेरे पास आज " 
मैं सन्डे को जाया नहीं करना चाहता था, और मुझे लगा आज तो छोड़ेंगी नहीं , 
और उपर  से हकीकत तो ये , " उसको बताने के लिए कुछ नहीं हैं मेरे पास" 
आधी उम्र तो काट दी हैं मैंने इसकी , अब आधी के लिए भी कोई ऐसा योजना नहीं हैं मेरे पास. 
सोचा इससे कट ही लेता हूँ ,  आवाज लगायी अपनी बिटिया को . 
और उसके साथ यूँ ही खेलने लग गया. 
ज़िन्दगी बेचारी मुझे घूरते हुए " फिर आउंगी " कहते हुए ओझल हो गयी. 

Monday, September 3, 2012

मेट्रो ....हर रोज़ की जंग


ऑफिस से निकला और नॉएडा सिटी सेंटर पहुंचा , 
देखा चेकिंग के लिए ही लम्बी लाइन लगी थी, 
१५ मिनट में चेकिंग के बाद प्लेटफोर्म पर पहुंचा , 
लम्बी लम्बी लाइन देख कर साँसे फूल रही थी, 
मेट्रो अभी आई भी नहीं थी, लोगो में लाइन में आगे लगने की होड़ सी लगी थी, 
जैसे ही मेट्रो आई , लोगो को एक दुसरे को धक्का मार सीट घेर की प्रतियोगिता चल गयी थी, 
जिन्हें सीट मिल गयी उनके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी , 
और जो खड़े रह गए , वो हाथ मल रह थे. 
मन ही मन बैठे हुए लोगो से जल रहे थे, 
ये हाल पहले स्टेशन का था, जहाँ से मेट्रो चली थी. 
धीरे धीरे मेट्रो आगे सरकती गयी और लोगो को अब सीट तो छोड़ खड़े रहने की जगह नहीं बची थी. 
फिर आया राजीव चौक , मेट्रो के सबसे संघर्ष वाली जगह. 
आधे उतरे और जो नहीं उतर पाया, चड़ने वालो ने उसे फिर से अन्दर कर दिया. 
वो चिल्लाता रहा , मगर किसी को परवाह कहाँ. 
इतने मैं एक सज्जन का पांव दुसरे के पाँव के ऊपर चढ़ गया, 
गाली गलौज का जो दौर शुरू हुआ, 
वो एक के स्टेशन आने पर ही रुका. 
जैसे तैसे मैं अपने स्टेशन कीर्ति नगर उतरा. 
लगा जैसे आज मैंने कितना संघर्ष किया. 
खुद को फिर तैयार किया , क्यूंकि अब दूसरी मेट्रो कीर्ति नगर से मुंडका पकड़नी थी, 
जंग वही फिर से लड़नी थी.  

Saturday, September 1, 2012

नन्ही सी एक बूँद ............


बादलो के अपने मखमली घर को छोड़ , 
जब वो अपने दुसरे घर जमीन को चली , 
तो उससे बहुत समझाया गया , 
तू छोड़ के चली जाएगी तो तेरा सुकून चला जायेगा, 
इतना आराम जो यहाँ हैं सब ख़त्म हो जायेगा. 
तू मिटटी में मिल जाएगी और तेरा वजूद मिट जायेगा. 
नन्ही बूँद ने उत्तर दिया , 
" मैं तो जन्मी ही धरती की प्यास बुझाने हूँ, 
मुझे रोकने से क्या फायदा , 
अंतत : मुझे एक दिन ये सुकून भरा घर छोड़ना ही हैं, 
फिर मैं उस समय की धरती के क्यूँ काम न आऊँ , 
जब उसको मेरी सबसे बड़ी जरुरत हैं. 
उसकी प्यास भी बुझ जाएगी और मेरा जीवन भी काम आ जायेगा. 
वर्ना किसी दिन जब उससे जरुरत ही नहीं होगी , 
मैं बाड़ के पानी का हिस्सा बन जाउंगी और फिर से किसी नदी नाले में मिलकर , 
फिर यही जीवन पाऊंगी. 
आज धरती सूखी हैं, मुझे न रोको , 
मिटटी में मिलकर तर जाउंगी , 
किसी फूल के पौंधे की प्यास बुझा कर, 
फूलो की तरह महक नया जीवन पा जाउंगी " 
अचानक बादलो में गर्जना हुई और वो नन्ही सी बूँद, 
ऊपर बादलो के घर को छोड़ , हवायो के रथ पर सवार होकर, 
धरती में समां गयी ,
जिस जगह वो बिखर कर चूर हुई, वही एक झुलसा हुआ गुलाब के पौंधा था, 
कुछ समय बाद वही एक गुलाब का फूल खिल रहा था.