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Wednesday, May 13, 2015

बड़ा डर लगता हैं....

कंक्रीट के इस जंगल में जिसे शहर कहते हैं ! बड़ा डर लगता हैं !!
अपनी दहलीज के परे कौन रहता हैं ! पता नहीं चलता हैं !!

अपनी ही कॉलोनी में कोई ! अपनी जान पहचान का नहीं मिलता हैं !!
तिरछी निगाहो से देखता हैं हर कोई यहाँ ! अपनी सीढ़ियाँ चढ़ते ही डर लगता हैं !!

कहते तो हैं सब यहाँ की  पढ़े लिखे और समझदार लोग रहते हैं ! मगर रोज़ छोटी छोटी बात पर लड़ते देखा हैं !!
पड़ोसियों को घर से दूर पार्क में बतियाते देखा हैं ! कंक्रीट की इन दीवारो के पीछे ज़िन्दगी को तड़पते देखा हैं !!

जरूरतमंद के लिए दरवाजा पटकते देखा हैं ! अदखाये पिज़्ज़ा बर्गर को कूड़े के ढेर में पाया हैं !!
भाषण देने के लिए बड़े बड़े मंच बिछते हैं ! अपनी कॉलोनी के पार्क के लिए कुछ करने की सुध किसी को नहीं हैं !!

अभिभावकों को कहते सुना हैं ! उस बच्चे के साथ नहीं खेलना हैं !!
खोखली हँसी हँसते लोगो को देखा हैं ! अपनी जुबान से झट पलटते देखा हैं !!

इस आदमी से मुझे क्या फायदा हो सकता हैं ! नफे नुकसान से तौलते हुए दोस्ती होते देखा हैं !!
दुःख दर्द साझा करने की तो बहुत दूर की बात हैं ! ख़ुशी में भी किराये की भीड़ को इकठ्ठा हुए देखा हैं !!

कंक्रीट के इस जंगल में जिसे शहर कहते हैं ! बड़ा डर लगता हैं !!

अपनी दहलीज के परे कौन रहता हैं ! पता नहीं चलता हैं !!

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