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Thursday, December 17, 2015

ख्वाइशों की पतंग बनी , मन की बनी डोर ..............

ख्वाइशों की पतंग बनी , मन की बनी   डोर !
उड चला मन बावरा , करने आसमान से होड़ !!

कभी बादलो से आंखमिचौली की , कभी किरणों से नहाया !
कभी  शाखों से खुद को बचाया , कभी खुले मैदानों को निहारा !!

कहीं पर लहलहाते खेत देखे , कहीं पर बंजर मैदान !
आसमां छूती इमारते देखी , कहीं झुग्गियों का ढेर !!

किसी बूढ़े को पार्क में सिसकते देखा , कही अलमस्त बच्चो का शोर !
कही एकदम वीरानी देखी , कही गाड़ियों की रेल !!

ख्वाइशों की पतंग बनी , मन की बनी   डोर !
उड चला मन बावरा , करने आसमान से होड़ !!


कहीं हिन्दू मुस्लिम को कहकहे लगाते सुना  , कहीं भाई भाई को लड़ते हुए देखा !
कहीं दूर एक औरत को पल्लू डाले कोसो दूर से पानी लाते देखा , कहीं नदियों के पानी को उफनते पाया !!

कहीं भूख से बिलखते बच्चो को देखा , कहीं पार्टियो के बचे हुए खाना का ढेर पाया !
किसान को हताश देखा , बिचौलियों को मौज उड़ाते देखा !!

कहीं नेताओ की   गलबहियां देखीकहीं आग उगलते सुना !
किसी रिश्वतखोर सरकारी अफसर को गरीब से पैसे लूटते भी देखा !!

ख्वाइशों की पतंग बनी , मन की बनी   डोर !
उड चला मन बावरा , करने आसमान से होड़ !!


गजब दुनिया के अजब निराले दृष्य देखे , एक सेठ को पांच रुपये के लिए नौकर को पीटते देखा !
वहीँ एक गरीब को मंदिर के दान पत्र में सौ का नोट डालते मुस्कराते पाया !!

अपने गांव की गलियाँ भी घूम आयाबचपन में एक पेड़ के तने में लिखा नाम ज्यो का त्यों पाया !
स्कूल को अपने पहचान नहीं पाया , टिन के शेड से उसको तिमंजिला बिल्डिंग पाया !!

उस मैदान का भी एक चक्कर लगा आया , जहाँ भूख प्यास भूल कर दिनभर क्रिकेट खेलता था !
मगर अखरोट के उस पेड़ को सूखा पाया , जिसमे पत्थर मारकर अखरोटो को खाता था !!

ख्वाइशों की पतंग बनी , मन की बनी   डोर !

उड चला मन बावरा , करने आसमान से होड़ !! 

1 comment:

  1. Don't who will be responsible for all of this .... Vishal Sharma

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