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Monday, June 29, 2015

कुछ पल ..............

ज़िन्दगी की पाठशाला का मैं एक मामूली सा छात्र हूँ ! रोज़ नए सबक सीखता हूँ !!
कभी भीड़ का हिस्सा बनकर सीखता हूँ ! और कभी कुदरत को निहारते हुए एकांत में सोचता हूँ !!

कुछ दिन ज़िन्दगी को यूँ ही बहने दिया ! न कोई प्लान बनाया , न कोई शिकायत की !!
ज़िन्दगी ने भी अपने होने का बहुत एहसास कराया , कभी फूल पत्तो में खिली तो कभी तितलियों में मुस्कराई !!

कभी बारिश की बूंदो ने भिगोया ! कभी सूरज की तपिश का अंदाजा किया !!
कभी थोड़ा फिर से बचपन जिया ! और कभी कुछ बुजुर्गो के साथ हो लिया !!

कभी प्रकृति को बड़ी देर तक निहारा ! कभी डूबते सूरज को अलविदा किया !
उगते सूरज की किरणों का स्वाद लिया ! तो कभी बहते पानी में थोड़ा गोता लगाया !!

लगा जैसे ये सब कुछ कही खो सा गया था ! काम की व्यस्तता से कुछ छूट सा गया था !!
दिल - दिमाग -शरीर में जैसे नयी स्फूर्ति सी आ गयी ! जीवन को फिर से दूने उत्साह से जीने की हिम्मत आ गयी !!

कभी यूँ ही फुर्सत निकालिये अपनी व्यस्त ज़िन्दगी से ! ज़िन्दगी को थोड़ा करीब से देखिये !!
ज़िन्दगी फिर से खूबसूरत दिखने लगेगी ! और खुद के लिए कुछ और मायने देखिये !! 

Thursday, June 25, 2015

राजनेता और राजनीति

"बड़ा फक्र होता हैं मुझे कभी की , भावनाओ को शब्दों के माध्यम से व्यक्त कर लेता हूँ !
किसी भी विषय  पर थोड़ा बहुत लिख सकता हूँ !!

मगर एक विषय पर कुछ लिखने  से पहले उलझ जाता हूँ, "राजनीति " और "राजनेता" शब्द से आगे नहीं बढ़ पाता हूँ !
अदभुत विषय हैं और बढ़ा कठिन हैं इस पर लिखना , शब्द भी उलझ जाते हैं !!

जो शब्द किसी और विषय की शोभा बढ़ाते हैं , इस विषय पर कुछ और हो जाते हैं !
शब्दों का मकड़जाल कुछ ऐसा बनता हैं , कहना कुछ और होता हैं मगर शब्द कुछ और ही बयां कर जाते हैं !!

नेता जी की झक सफ़ेद कुर्ते पायजामे के अंदर ना जाने कितने पैबंद हैं !
हाथ जोड़े हथेली के अंदर जाने कितना बड़ा खंजर हैं !!

इस विषय  को शब्दों से  बयां करना , जैसे  सूरज को आइना दिखाना हैं !
नेता जी को समझना जैसे हिंदी भाषी को जर्मन समझना हैं !!

उसूल , नियम , नैतिकता , मानवता , सुशासन , प्रगति, रिश्ते-नाते  - ये सब इस विषय में जनता को लुभाने के शब्द हैं !
अराजकताप्रलोभन , भ्रस्टाचार , भड़काऊ भाषण  - ये  सब इस विषय के चहेते शब्द हैं !!

कुर्सी के  लिए यह दौड़ अदभुत हैं , जिसको मिल गयी वो छोड़ने को तैयार नहीं हैं !
जिसको नहीं मिली हैं , वो दूसरे की कुर्सी पर घुन बनकर कुतरने की तैयारी में हैं !!

दोस्ती और दुश्मनी की इनकी कहानी बड़ी बेमिसाल हैं , जनता के  सामने लडना और रात को गलबहियां जारी हैं !

कोई  समझ सका इन राजनेताओ को  और राजनीती को , कब -कहा - कैसे - क्यों -क्या हो जाये कहना  भारी हैं !!"

Tuesday, June 23, 2015

फुर्सत के कुछ पल …

कुछ  दिन  एकांत में  बिताने का  मौका  मिला , अपने शहर से बहुत दूर !
कुछ क्षण अपने को फिर से समझने का मौका मिला , आदी हो चुके अपने माहौल से बहुत दूर !!

अपने को प्रकृति के  बहुत करीब पाया , ठंडी   हवाओ को अपने गाल  सहलाते फिर से महसूस किया !
बदन में हुई थिरकन को बरसो  बाद फिर महसूस कियाचिड़ियों की चहचाहट का संगीत सुना !!

बनावटी कोलाहल से  दूर - प्रकृति के  संगीत का आनंद लिया , मन जैसे फिर से रम गया !
कंक्रीट के  महलो  के सभ्य इंसानो से इस छोटी  सी जगह के  इंसानो को  जीवन जीते जीते देखा !!

सच में कितनी मशीनी और  व्यवसायिक  हो गयी हैं ज़िन्दगी हमारी , थोड़ा सुकून जब मिला तब सोचा !
कहता तो हूँ सब अपने लिए ही तो कर रहा हूँ , वोअपने लिए वाला समयकब मिलेगा कभी नहीं सोचा !!

टटोला दिल को अपने कुछ फुर्सत के क्षणों में , बहुत कुछ बीत जाने और खो जाने का एहसास हुआ !
फिर भी ढाँढ़स इस बात का बँधा  की ,  वक्त ने फिर मुझे समझने का मौका दिया !!

उसी पुराने "आनन्द " से फिर अपना परिचय हुआ ! खो गया था भीड़ में कही , अपने को भूल गया था !!
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मैं कितना उलझ गया था ! यकीनन वो भी बहुत जरुरी था !!

मगर अपने वजूद को भूल जाना कहा तक सही था , जारी हैं मेरा ये कारवां !
जीवन को समझने का दौर कभी तो विराम लेगा !!


रात -दिन -सवेरे

कुछ यादों की गठरी बांधे ! कुछ कल  के सपनो की पोटली !!

जीता हूँ आज को मैं इस तरह ! करते कुछ हँसी ठिठोली !!

जब उदास होता हूँ कभी ! खोल लेता हूँ अपनी गठरी !!

आँखों की कोरे गीली होती हैं ! मन के बोझ थोड़ा हलके !!

फिर चल पड़ता हूँ अपनी राह में ! कभी तेज और कभी हल्के -हल्के !!

कही कही उजाला मिलता हैं ! और कही कही घने अँधेरे !!

विश्वास खुद पर रखकर ! कटते रहते हैं रात -दिन -सवेरे !!

कभी कोई साथ  हो  लेता हैंकहीं कहीं मैं किसी के पीछे !!

कुछ यादों की गठरी बांधे ! कुछ कल  के सपनो की पोटली !!

जीता हूँ आज को मैं इस तरह ! करते कुछ हँसी ठिठोली !!


कुछ सीखता हूँ और कुछ सिखाते चलते ! कटते रहते हैं रात -दिन -सवेरे !!

Sunday, June 21, 2015

मैं उम्मीद में जीता हूँ......





"मैं उम्मीद में जीता हूँ  , हर इंसान में भगवान देखता  हूँ !
अच्छा - बुरा  कोई जन्म से नहीं होता , हालातो के असर इंसानो में देखता हूँ !!

उजाले में भी दीया जलाकर रखने की आदत हैं मेरी , क्यूंकि उजाले में भी आँख बंद किये लोगो को देखता हूँ !
दुनिया जिन्हे लाख बुरा कहती हैं उनकी आँखों की कोरे में हलकी पानी की लकीर देखता हूँ !!

बुराई पर अच्छाई की जीत का गवाह है इतिहास , बुरे लोगो को भी सद्ज्ञान देते सुना हूँ !
इंसानियत काबिज रहेगी दुनिया में ताउम्र , इसी उम्मीद में हर रोज़ अपनी आँखे  खोलता हूँ !!

जीवन जीना हर कोई चाहता हैं और सबको उस " एक खुदा " की संतान समझता हूँ !
सबका जीवन बेहतर हो और सबको जिंदगी को  मायने मिले - हरदम यही दुआ करता हूँ !!

मैं उम्मीद में जीता हूँ  , हर इंसान में भगवान देखता  हूँ !
अच्छा - बुरा  कोई जन्म से नहीं होता , हालातो के असर इंसानो में देखता हूँ !!"

Saturday, June 13, 2015

मंजिल....


बहुत दूर जाना हैं अभी , अभी तो कदम उठाये हैं !
पता हैं रास्ते आसान नहीं होंगे, मगर इरादे पक्के हैं !!

न मानूँगा हार मंजिल से पहले , क्यूंकि पलट कर जाने का अब कोई इरादा नहीं हैं !
इम्तेहान अब मेरे हौंसले और मेरी मंजिल का हैं , बस अब आगे ही बढ़ते रहना हैं !!

नन्ही बूंद ....

प्यासी धरा ,
शोले बरसाते सूरज के बीच ,
जब वो नन्ही बूँद धरती पर गिरी ,
कमाल हो गया ,
धरती का रोम रोम जैसे फिर से खिल गया ,

नन्ही नन्ही बूंदो ने अपने को कुर्बान कर दिया ,
न देखा उसने अपना आसमां में रहने का सुख ,
समां गयी धरती की गोद में,
एक नन्हे पौधे को जीवन  दान दे दिया।