Amazon-Buy the products

Monday, July 27, 2015

कलाम सर , लौट के जरूर आना.......


शब्दों की सीमा पता चल गयी , समझ  गया कलम का रुकना !
इतना सा कहना हैं  और लिखना हैं - कलाम सर , लौट के जरूर आना !!

आँखे नम हैं , दिल भारी , कागज भी फड़फड़ा रहा - हे ! भारत रत्न देखो आज आसमान भी जार जार रो रहा !
तुम चिरनिद्रा में सो गए , हे ! कर्मयोगी युगपुरुष हमसे रूठ क्यों चले गए !!

क्या लिखूं , कैसे परिभाषित करूँ - कैसे तुम अब्दुल से कलाम बने ? !
कहाँ से शुरू करूँ , कहाँ ख़त्म करू - कैसे तुम रामेश्वरम से भारत माँ के लाल बने ? !!

शब्दों की भी अपनी एक सीमा हैं , तुम उससे परे !
हे ! मानवता के अग्रदूत - अब्दुल , तुम "कलाम" को सही अर्थ दे गए !!  

Saturday, July 25, 2015

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं .....




चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
 हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!

थोड़ा बचपन को फिर से जीते है और थोड़ा बिना बात के खिलखिलाते हैं !
कुछ दोस्तों को फ़ोन लगाते हैं और वही बचपन के नाम से उसे चिड़ाते हैं !!

कुछ देर यूँ ही टहलते हैं , यादो के गलियारों के गोते लगाते हैं !
समझदारी और अनुभव को परे रखकर , बच्चो के साथ दौड़ लगाते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!


अपनी चम्पक , चाचा चौधरी  और साबू की दुनिया को बच्चो के कार्टून नेटवर्क में खोजते हैं !
बारिश में अपने को थोड़ा भिगोते हैं और कपड़ो में थोड़ा मैल लगाकर रुआंसा सा मुहं बनाते हैं !!

ऑफिस से किसी दिन बंक मारते हैं और यूँ ही निठल्ले होकर बाजार घुमते हैं !
जिसके साथ कुछ गिले शिकवे थे , कभी उसे गले लगाते हैं !!

भूल गए जो खेल बचपन के , जरा उसे खेलते हैं !
कंचे , पतंगबाजी , गुल्ली डंडा , खो खो और कबड्डी में जरा फिर हाथ आजमाते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!

अपने जो रूठ गए हैं , उन्हें मनाते हैं !
वो हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण पन्ना हैं , उन्हें याद कराते हैं !!

कल की चिंता को दूर रख किसी दिन तो अपने लिए जीते हैं !
वही अल्हड़पन , वही बेबाकी और ज़िंदादिली किसी दिन जीते हैं !!

चलो , ज़िन्दगी को कुछ सरल बनाते हैं ! चिन्ताओ और आशंकाओ को थोड़ा दूर भगाते हैं !!
हर समय फसी फसी सी ज़िन्दगी को थोड़ा सुकून दिलाते हैं ! ज़िन्दगी को ज़िंदादिल बनाते हैं !!


Saturday, July 18, 2015

क्रांति की ज्वाला .....


"वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! 

बदलना हैं हमें सब कुछ अब हमने ठान ली हैं!
यूं घिसट घिसट कर जीने से ज़िन्दगी नहीं जीनी !!

राह में आएंगे रोड़े और पहाड़ भी !
कितनी बार साँस भी फूलेगी और दम तोड़ेगा हौंसला भी !! 

मगर यूँ देखते रहने से हालात बदलने वाले नहीं !
हाथ पर हाथ रखे रहने से कुछ सुधरने वाला नहीं !!

वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! 

रावणो को भी अब सोचना होगा,कुम्भकर्णो को नींद से जागना होगा !
हर एक को अब राम बनना होगा !!

माना लम्बी लड़ाई हैं , मगर कदम तो उठाना होगा !
घुप्प अँधेरी रात है  दीया तो जलाना होगा !!

बदलना होगा सबको , अपने अंदर के इंसान को जगाना होगा !
खुद के अंदर की कुंठा को शोलो से दहकाना होगा !! 

सुधर जाओ नरकासुरो अब, माँ बहने सब जाग गयी हैं !
होश में आओ हुक्मरानो , जनता हिसाब मांगना सीख गयी हैं !!

वक़्त आ गया हैं जब हम बदलेंगे तब ये सूरत ऐ हाल बदलेगी !
हर क्रांति की ज्वाला हमसे ही पहले निकलेगी !! "

Wednesday, July 15, 2015

कैसे है ? बढ़िया !

एक मित्र मिले रास्ते में , हाथ मिलाया और पूछा ," कैसे हैं ?"  !
हमने भी वही रटा रटाया दिया जवाब - " बढ़िया , आप सुनाओ "  !!

फिर बातचीत का दौर शुरू हुआ और पंद्रह मिनट तक चला !
हमने ऑफिस से बात शुरू की , मोहल्ले वालो की टांग खींची !!

थोड़ी राजनीती की  ऐसी तैसी करी , फिर थोड़ा सोसाइटी में हो रहे बदलावों की फिक्र करी !
"अच्छा यार संडे को फुर्सत से बात करते हैं " कहकर हाथ मिलाया और अपने घर की राह पकड़ ली. !!


घर आया , थोड़ा सुस्ताया और सोचा , " जब इतना कुछ हो रहा हैं , तो कैसे कोई बढ़िया हो सकता हैं ?" !
नौकरी का मेरे कल का भरोसा नहीं , कोई कुछ मदद करेगा ऐसे मेरे करम नहीं !!

बच्चों को कुछ सँस्कार दे सकूँ , इसके लिए फुर्सत नहीं !
राजनीति में कुछ असर असर डाल सकूँ , चुनाव के दिन वोट मैं  डालता नहीं !!

कुछ अपने भविष्य के बारे में सोचूं , कुछ सूझता नहीं !
खर्चे बढ़ गए हैं अब सैलरी से कुछ होता नहीं !!

सामाजिकता मेरी फेसबुक और व्हाट्सप्प में सिमट गयी हैं , पडोसी को में जानता नहीं !
सेहत के लिए कुछ करने की सोचूं तो पार्क मेरे घर के नजदीक कोई हैं नहीं !!

मिलावटी खाना खा खाकर  बीमार सा हो गया हूँ , ताज़ी हवा के लिए पेड़ पौधे नहीं !
अब आपसे पूछता हूँ , " कैसे हैं आप ? " , बढ़िया हूँ कहना नहीं !! 

Tuesday, July 7, 2015

हुबली , कर्नाटक से दिल्ली तक ( काव्य यात्रा वृतांत ) ..........

"हुबली,कर्नाटक से ट्रेन पकड़ी निकला दिल्ली ओर,  38 घंटे के सफर में साथ था कोई और !
साफ़ सुथरे हुबली स्टेशन पर समय  पर  लग गयी ट्रेन,बैठ गए  जी चल दी  अपनी ट्रेन !!

लोंडा जंक्शन पर जा जाकर रुक गए ट्रेन के चक्के, पता चला यहाँ से बदले  जायेंगे डब्बे !
गोवा  एक्सप्रेस आयी वास्को से , डब्बे लगा दिए गए  उसके पीछे !!

बेलगाम एक जगह आयी, अब ट्रेन में जमकर सवारी आयी !
"मील्स ओन व्हील्सके एक भाई साहब की "खाना ले लो" की आवाज आयी !!

खा पीकर हम सो गए , कुछ शोर हुआ तो  आँख खुली !
नीचे वाले भाई  साहब बैग कंधे में डाले उतर रहे थे , पूछा तो बोले हम पुणे गए !!

ये ट्रेन भी गजब चीज हैं , कोई भेदभाव नहीं करती !
हिन्दू, मुस्लिम , सिख , ईसाई - सबको अपने चक्को से खींचती !!

कोई छात्र, कोई सरकारी बाबू, कोई  फौजी , कोई प्राइवेट नौकर, कोई व्यापारी  !
बिना भेदभाव के बस सीटी बजाकर सरपट दौड़ती जाती !!

पहुंची ट्रेन फिर एक स्टेशन - नाम था मनमाड , वहाँ मिल रहे थे १०० रुपये में  तीन किलो अनार !
दिल्ली पहुँचते पहुँचते कैसे हो जाते हैं यही १५० रुपये में एक किलो अनार !!

मध्य प्रदेश पहुँच गए आप , मोबाइल में एक सन्देश आया !
ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी , नाम देखकर मैं भी चौंका !!

खांडवा था स्टेशन  का नाम , किशोर कुमार साहब के कुछ गाने याद गए !
मानसून की बारिश से मिटटी की भीनी भीनी खुशबू रही थी, खेत फिर तैयार हो रहे थे , जुताई चल चल रही थी !!

मिटटी की रंगत जगह जगह बदल रही  थी, कर्नाटक की लाल मिटटी - महाराष्ट्र में काली और  मध्य प्रदेश  में धूसर हो रही थी !
पठारों की उच्चाई अब कम हो थी, हुबली से चली ठंडी हवाएँ अब गर्म हो चुकी थी !!

सूरज अब धीरे धीरे डूब रहा था , सामने इटारसी  स्टेशन रहा था !
इटारसी में ट्रैको का जाल बिछा था , मध्य  रेलवे का सारा भार शायद  इसी पर था !!

फिर ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी , अगला स्टेशन भोपाल था !
अब रात  हो चुकी थी , हल्की हल्की ठंडी हवाओ का झोंका आया था !!

मानसून की बरसात का भोपाल में एहसास हुआ, झमाझम बारिश से नवाबो का शहर गुलजार हुआ !
रात के दस बज चुके थे , बर्थ की बत्तियाँ किसी ने बुझा दी और हमारा  भी नींद की आगोश में समाना हो गया !!

सुबह आँख खुली तो फरीदाबाद का स्टेशन दिखा  , झाँसी - ग्वालियर - आगरा - मथुरा सब रात रात में ही गुजर गया था !
३८ घंटे का सफर निजामुद्दीन स्टेशन पर ख़त्म हो चूका था , ट्रेन :१० पर स्टेशन लग गयी थी जबकि उसे :१५ पर पहुँचना था !!

मन ही मन रेलवे का समय पर पहुँचाने का धन्यवाद किया , बैग पकड़ा और अपने घर की ओर चल दिया !
फिर किसी दिन  एक यात्रा होगी , मेरा कवि मन फिर ललचायेगा और अपना यात्रा वृतांत फिर आपको सुनायेगा !!"


( हुबली से दिल्ली तक यह यात्रा मैंने 5 जुलाई से शुरू की और 7 जुलाई को मैं दिल्ली पहुँचा  और चूंकि साथ में कोई नहीं था , अपनी यात्रा को आप तक पहुचाने के लिए कलम का सहारा लिया )

Saturday, July 4, 2015

बेजुबान.......


"कभी किसी तस्वीर को देखकर शब्द भी कुछ बयां नहीं कर पाते ! 
तस्वीर ही सब कुछ बयां कर देती हैं !!

शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं , तस्वीर को समझाने में !
हम इंसानो के पढ़े लिखे संसार में बेजुबान बहुत कुछ कह जाते हैं !!"