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Monday, June 13, 2016

आधुनिक कहकहे - भाग १

कुर्सी की खातिर बिक गया सब दीन -ईमान !
सत्ता के लिए इकठ्ठा हो गए सब बेईमान !!
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नाममात्र के  रिश्ते रह गए , ख़त्म हो गया अपनापन !
बेटा पूछे बाप सा , कितना छोड़ जाओगो मेरे लिए धन !!
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हवा में जहर घुल गया , पानी हुआ दूभर !
धरती सारी बंजर हुई , अब कहाँ उपजे अन्न !!
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बेटी जब बहु बनी , माँ बनी सास !
घर में क्लेश मच गया , न बची कोई आस !!
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दिन में महिला शक्ति की बात , रात में उठाए बीवी पर हाथ !
बेटी बचाओ के नारे लगाए , जन्मे दूसरे के घर में -मन में ये बात !!
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 बात बात में टूट रहे रिश्ते , खो रहा धैर्य और विश्वास !
कोई झुकने को तैयार नहीं , सबका अपना अपना स्वार्थ !!
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दादी - नानी की कहानियाँ , अब हो गयी पुरानी बात !
पोगो, हंगामा , डिज्नी अब दे रहे बच्चों का साथ !!
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 बदल गयी हैं दुनिया , बदल गयी इसकी रीत !
घर के मुखिया सब बन गए , नहीं रही अब वो प्रीत !!
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बेटा कहे बाप से - आउटडेटेड हो गए हो आप , आपको दुनिया की समझ नहीं !
बाप बोला बेटे से , चालीस साल पहले मेरे पिताजी ने भी यही बात मुझसे कही !!
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दोस्त अब ऑनलाइन मिलते हैं , घंटो बतियाते हैं !

मुश्किल घड़ी आ जाये तो ऑफलाइन और अंरेचेबल हो जाते हैं !!
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