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Wednesday, November 9, 2016

ऐ ! सैलरी , जरा धीरे धीरे गुजर। ( सभी वेतनभोगी कर्मचारियों को समर्पित)


तेरे इन्तजार में न दिन देखा-न रात ,
अब आयी हैं तो जरा ठहर !

मुझे तेरे होने का एहसास तो होने दे ,
कुछ वक्त तो मेरे साथ गुजार ले !

तेरे आने की आहट से ही दिल सुकून से भर जाता हैं ,
तेरे जाने पर दिल मेरा जार जार रोता हैं !

जब तक तू मेरे साथ रहती हैं ,
मेरा हर दिन होली , रात दिवाली होती हैं !

तेरे चले जाने के बाद ,
हर दिन बेरंग और रात अमावस होती हैं !

तू तो इतरा कर चली जाती हैं ,
तुझे इल्म नहीं हैं शायद , उसके बाद मुझपर क्या बीतती हैं ? !

तेरे फिर से आने के ख्यालो से जी लेता हूँ ,
हर रोज़ जी और मर लेता  हूँ !

अब आना -तो थोड़ी फुरसत लेकर आना,
कुछ दिन और रुककर मुझे ज़िंदा होने का एहसास करा जाना !

तेरी बाट जोहूंगा ,
हो सके तो समय पर आ जाना ! 

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