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Tuesday, November 8, 2016

पलायन का दर्द




छोड़ कर अपना घोंसला एक दिन , 
उड़ पड़ा  पंछी नया आसमां ढूंढने , 

नए पंखो की उड़ान लंबी थी , 
सब कुछ नाप जाने की ललक भी थी , 

नई उम्मीदे , नए हौंसले 
नव किरण की आस लिए 

माँ ने समझाया - बाप ने बुझाया ,बहनो ने रिझाया - भाइयो ने हड़काया। 
सबकी अनसुनी कर , उड़ चला वो मस्तमौला अपनी दुनिया से अनजानी दुनिया में रम गया।।

वो नयी दुनिया पाकर मस्त हो गया , घोंसला उसका बिखर गया ।  
उसको नया आसमां रास आ गया , पीछे उसका सब कुछ छूट गया।।  

बहुत कुछ मिल गया उसे ,  पा लिया सबकुछ  जिसकी उसको चाह थी।  
मगर बैचैनी थी  कुछ उसे , शायद उस मिटटी में कुछ अलग बात थी।। 

चकाचौंध की अपनी नयी दुनिया में, अब उसे सुकून की तलाश थी।  
रौंदा था जिस मिटटी को बचपन में , शायद उसको उसकी खुशबूं अब भी याद थी।।

स्वंछंद और बेफिक्रे घूमने की शायद  उस पर पाबन्दी थी।  
डरा डरा रहने की शायद , नए आकाश में  मजबूरी थी।।  

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